एक कमरा, एक बूढ़ा आदमी और 6 मूर्तियां: जीवन के 42 साल का सबसे बड़ा सबक!

दीवार पर मूर्तियाँ लगी हुई है

हेलो दोस्तों,

आप ही की तरह इस दुनिया में हर कोई सक्सेसफुल होना चाहता है। पर सबसे ज़रूरी ये होता है कि आपके लिए सक्सेस होना क्या है।

आज जो मैं आपको बताने वाला हूँ वो मेरी ही Fictional कहानी  है। मैंने अपनी ज़िंदगी के 42 साल निकाल दिए हैं। और यही वजह है कि आपको मेरे अनुभवों को जानना चाहिए, क्योंकि पॉइंट-ऑफ़-व्यू तो सभी का अपना-अपना होता है। लेकिन अनुभव से जो बात समझ आती है, वो लोगों के लिए बहुत काम होती है।

मेरा नाम हिमांशु है, मेरी उम्र 42 साल है। पर मैं खुद बूढ़ा नहीं हूँ, जो अपने से जवान लोगों को कुछ कम समझता हो और खुद को बहुत ज़्यादा समझदार। मैं सिर्फ़ अपने जीवन का एक किस्सा आपको बता रहा हूँ, जो शायद आपको समझा सकता है कि, असल में एक कामयाब इंसान क्या होता है।

STORY (कहानी):

ये उन दिनों की बात है जब मैं 22 साल का था। 22 साल तक की मेरी ज़िंदगी कुछ खास नहीं थी, बस अपने घरवालों की छाया में रहना और थोड़ा बहुत पढ़ाना। लेकिन जब मैं लगभग 22 साल का था, तब मैंने घरवालों से कहा कि मुझे शहर में जाना है.. अलग कमरा लेकर पढ़ना है। वो रोज मुझे ताने सुनाते थे कि तुम सारे दिन घर बैठकर टाइम पास करते रहते हो। इसलिए उन्होंने पढ़ाई के नाम से मुझे बड़े शहर में भेज दिया। मैं मिडिल क्लास फैमिली से था तो उन्होंने कम किराए वाले कमरे के लिए, कुछ रेस्टोरेंट वालों से बात की जो शहर में रहते थे। फिर एक दिन मेरी मासी का फोन आया कि, उनके पुराने घर के पास में एक घर है जहाँ एक आसपास रहता है जो एक कमरा किराए पर दे रहा है। वह एक बुज़ुर्ग (बूढ़ा) आदमी और एक कपल (पति-पत्नी) रहते थे। तब पापा ने मुझे उस घर में कम किराए का कमरा दिला दिया।

मेरा कमरे में आना :

मेरे नए कमरे में मेरा पहला दिन था। वह कमरा छोटा था पर थोड़ा अजीब भी था। क्योंकि वह कमरे बाकी कमरों की तरह बिल्कुल नहीं थे। वह कमरा कुछ ऐसा था – चार तरफ बड़ी बड़ी खिड़कियां जो बंद कर दीं, सोने के लिए एक बहुत ऊँचा फोम का बिस्तर, और ऊपर दीवार पर लटकी हुई एक बहुत बड़ी और पुरानी मिट्टी की मूर्ति। उस बड़ी मूर्ति में बहुत सी छोटी-छोटी मूर्तियाँ थीं -: एक किसान, एक व्यापारी, एक अप्राधी, एक अधिकारी, एक भिखारी और एक स्टूडेंट की।

मैं अगले ही दिन सुबह, उस बुज़ुर्ग आदमी के पास गया जो मेरे पास के कमरे में रहता था। मैंने उनसे उन मूर्तियों के बारे में पूछा। तो उन्होंने कुछ देर मेरी तरफ देखा और फिर सामने कुर्सी पर बैठने को कहा। वो मेरे सामने बैठे। उन्होंने पूछा, तुम यहाँ क्या करने आए हो। मैंने कहाँ पढ़ाई करने आया हूँ।

वो थोड़ा मुस्कुराकर बोले: मैं तुम्हारा बाप नहीं हूँ, मुझे तुम सच बोल सकते हो। बताओ बेटा, तुम यहाँ क्यों आए हो..?

मैंने कुछ देर रुक कर, अपने मन की बात कही :- ”मुझे नहीं पता मैं यहाँ क्यों आया हूँ, क्योंकि मुझे बस ज़िंदगी में कुछ करना है, और घर-परिवार के साथ मेरी ज़िंदगी एक डिस्ट्रैक्शन है, जो मुझे वक़्त के गुज़रने का एहसास नहीं होने देता। पर इस डिस्ट्रैक्शन के साथ ही अपनी ज़िंदगी को गुज़र देना.. क्या ये गलत नहीं है?” और घरवाले मुझे ताने देते हैं कि आस पास के मेरी उम्र के लड़के, या तो सरकारी नौकरी करते हैं या बहुत ज़्यादा पैसा कमाते हैं। और तुम सारे दिन घर पर बैठे रहते हो। मुझे इन सबसे प्रेरणा हो गई थी.. अब मैंने सोचा है कि, मैं यहाँ से बहुत पैसे कमाऊंगा, घरवालों को आधे पैसे भेज दूंगा। और अपने पैसों से अपनी ज़िंदगी को जिऊंगा। मुझे भी सफल होकर दुनिया देखनी है और मज़ा करना है।

बूढ़ा आदमी:  ठीक है मैं तुम्हारी बात को मान लेता हूँ। तुम अपने परिवार के डिस्ट्रैक्शन से दूर, इन अनजान लोगों में राह करके कुछ बनना या करना चाहते हो। ठीक है! पर तुम जिंदगी में क्या ही अचीव कर सकते हो, एक प्राइवेट या सरकारी नौकरी, बिज़नेसमैन या और कुछ भी बन जाओ। कितने भी बड़े लेवल पर काम करो। लेकिन तुम करोगे तो काम ही ना.. क्या वो एक डिस्ट्रैक्शन नहीं है!

हा.. अगर तुम कहो कि इस डिस्ट्रैक्शन में पैसे कमा सकते हो। तो क्या तुम अपनी इस तरह के सालों बाद मिलने वाली एक किम्टी जिंदगी को पैसे कमाने की भागमभाग में ही खत्म कर देना चाहते हो। क्या तुम ये नहीं समझ पा रहे हो कि, इस दुनिया के लोगों का सबसे बड़ा डिस्ट्रैक्शन तो ये पैसा ही है। ये हमारी दुनिया है, ये ज़मीन हम सब की है, पेड़ या हर चीज़ जो नेचर में है वो हम सबके लिए ही तो है। हमारी इस ज़मीन पर हम अनाज उगाकर, अपना पेट भर सकते हैं, और अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी जिंदगी बिता सकते हैं।

क्योंकि इंसान के लिए ये दुनिया उतनी बड़ी नहीं होती है, जितना की वो सोचता है। तुम ही बताओ, आज तक तुमने कितने ही लोगों से बात की होगी। ज्यादा से ज्यादा 100 या 150। अब इनमें से वो लोग निकाल दो जिनसे बस ऐसी ही बात की और उन्हें तुम कभी याद नहीं करते। अब बचेंगे ज्यादा से ज्यादा 40 लोग। और इन 40 में से अपने परिवार और खास दोस्त (लगभग 7-9) लोगों को छोड़ कर, तुम मुश्किल से ही किसी से मिलते हो या बात करते हो। मतलब तुम्हारी दुनिया, तुम्हारा परिवार और 1 या 2 सबसे खास दोस्तों तक ही सीमित है। तुम्हें कहीं भगाने की जरूरत नहीं। उनके साथ रहना डिस्ट्रैक्शन नहीं है बालकी वो ही जिंदगी है। वो तुम पर प्रेशर इसी लिए देते हैं ताकि तुम पैसे नहीं कमा रहे हो।

अब मैं तुम्हें पैसों के लिए, अपने गाँव में ज़मीन पर खेती करने को नहीं कहूँगा। क्योंकि हमारे मूर्ख पूर्वजों की मूर्खता और सदियों से चल रही है इन देशों की भ्रष्ट सरकारों के कारण, इस दुनिया में सभी को समान ज़मीन और संसाधन नहीं मिल सके। पर मैं तुम्हें यही समझाना चाहता हूँ कि, अपनी ज़िंदगी को पैसे बढ़ाते रहने में ही मत गुज़र देना। क्योंकि यह गरीबी अमीरी का फ़र्क मूर्ख लोगों ने बनाया है। कम पैसे कमाकर भी अगर तुम अपने और अपने परिवार का पेट भर सकते हो.. तो काफ़ी है।

इस दुनिया का सिर्फ़ एक ही अंत है, और वो है… संतोष!

अपने आपको संतोष देकर अगर अपने परिवार की खुशियों से भरी ज़िंदगी निकाल दोगे.. तो समझ लो तुम सफल बन गए!

क्योंकि ना तो ऐश-आराम की कोई सीमा होती है ना धन की.. और अगर इन दोनों को ही सफलता मान कर संघर्ष करोगे.. तो ज़िंदगी में सिर्फ़ संघर्ष ही होगा संतोष नहीं।

और संतोष ही हमारी इच्छाओं, लोभ-लालच, ऐश-आराम का आखिरी हिस्सा है।

“संतोष नहीं पाओगे, तो कहीं खो के ही रह जाओगे..

आखिर में याद करोगे उन परिवार के साथ बिताए लम्हों को,

और आंसुओं को बहाकर सब यही छोड़ जाओगे”

मैं : यह सब सुन कर में कुछ नहीं बोला उर वहीं से जाने लगा..

बूढ़ा आदमी: तुम बिल्कुल मेरे पोते की तरह ही हो, वो भी तुम्हारी तरह बहुत कुछ सोचता रहता है।

मैं: अब वो कहाँ रहता है?

बूढ़ा आदमी: उसके पिता रणधीर (मेरा बेटा) का बड़ा बिज़नेस था। रणधीर उसको अपनी ही तरह बिज़नेस में लगाना चाहता था। पर वो थोड़ा अलग ही था, उसको कुछ बनना नहीं था.. bss वो चाहता था कि सभी लोगों को समान दर्जा मिले. वो अपनी युवा उम्र में था लेकिन बहुत कुछ सोचता था. और जो भी सोचता वो मुझे आकर बताता था.

वो कहता है कि अमीर और गरीब इंसान में क्या ही फर्क है. वो कहता है कि मुझे गरीब बेसहारा लोगों की मदद करनी है. और मैं कहता हूँ कि तू अकेला क्या ही कर लेगा.

फिर कुछ दिनों तक उसके पापा रणधीर ने उसको काम पर कंपनी में बुलाया और काम समझाया. 1 या 2 साल में वो काफी सीख गया. रणधीर ने बिज़नेस में उसके नाम पर कर दिया। और कुछ ही महीने गुज़रेंगे कि उसने एक खुद का चैरिटी फंड बनाया, और अपने नाम पर हुई पूरी कंपनी को ही बेच दिया.. और सब कुछ कंपनी के वर्कर्स में और कुछ गरीब लोगों के विकास में दे दिया।

इस हक से उसकी माँ और रणधीर इतने प्रेज़न हुए कि वो रोज़ उसे घंटों तक ताने सुनाते थे और कहते थे कि अब तुझे कौन कमा के खिलाएगा। वो कुछ नहीं कहता था..वो चुप रहता था.. लेकिन मैं जानता था कि वो अंदर से खुश है। क्योंकि उसकी सोच ये थी कि “उसके माता-पिता के पास इतना पैसा है कि वो खुद की जिंदगी निकाल सकते हैं, और मैंने अपनी जिंदगी का वो अंजाम हासिल कर लिया है जिसे करने के बाद मुझे संतोष मिल चुका है”.

संतोष ही मोक्ष है. जिस कमरे में तुम रहते हो वो मेरे पोते का ही था. और जिस बड़ी मूर्ति की तुम बात कर रहे हो वो मेरे पोते ने ही बनाई थी. वो मूर्ति दिखती है कि.. इंसान चाहे अमीर हो या गरीब, अपराधी हो या अधिकारी, किसान हो या बिजनेसमैन.. इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता. ये इंसान के सफल होने को नहीं दिखता।

इसलिए इस दुनिया में सफल होने का मतलब सिर्फ एक ही है वो है “संतोष

!उम्मीद करता हूँ कि आप अपनी ज़िंदगी के आखिरी पलों में अपनी बिताई हुई ज़िंदगी से संतुष्ट होंगे!

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