इंट्रोवर्ट से एक्सट्रोवर्ट तक: मेरे अनुभव की कहानी!

एक लड़का मुँह छुपाकर अपनी आँखों से देख रहा है। इंट्रोवर्ट से एक्सट्रोवर्ट "लिखा है

आप ​​एक इंट्रोवर्ट (अंतर्मुखी) इंसान हैं। एक ऐसा इंसान जो लोगों से ज़्यादा बात नहीं करता। लेकिन यह सिर्फ एक जनरल स्टेटमेंट है। क्योंकि सभी इंट्रोवर्ट लोग एक जैसे नहीं होते। पर इंट्रोवर्ट इंसान चाहे कितनी भी तरह के हों, उनमें कुछ बातें एक जैसी ही होती हैं।

इसी प्रकार मैं भी आप ही के जैसा था। मैं हूँ (“Story of 7 Stars” का लेखक और मालिक) । मैं बहुत ज़्यादा डिटेल में नहीं जाऊंगा। मैं बस आपको 4 पॉइंट्स के द्वारा इंट्रोवर्ट और एक्सट्रोवर्ट होने के अपने अनुभव, के बारे में बताऊंगा।

ये पॉइंट्स इस तरह हैं :

इंट्रोवर्ट होना कैसा है :-

यह आर्टिकल मैं इसी लिए लिख रहा हूँ, क्योंकि ये मेरे (लेखक) जीवन की ही कहानी है। मैं जो बातें बताऊंगा वो सब मैंने अपनी ज़िंदगी से ही सीखी है।

चलिये शुरू करते हैं।

“जहाँ तक मुझे बचपन याद आता है, मैं बचपन में काफी बोलता था। ऐसा मेरी माँ भी मुझे बताती है। शायद बचपन में ज़्यादातर बच्चे बोलते ही हैं। पर बचपन का ये एक्सट्रोवर्ट(बहिर्मुखी) होना, मेरे 10 या 11 साल का होने तक ही था। क्योंकि मैं घर पर तो बहुत बोलता था। लेकिन स्कूल में बिल्कुल नहीं बोलता और खुल कर हसता भी नहीं था।

सच कहूँ तो इसका एक बड़ा कारण यह था कि पहले हमारा घर एक पूरा परिवार था। जिसमे हम लगभग 8-10 लोग थे। लेकिन में जब 10 साल का था। मेरे दादा-दादी एक्सपायर हो गए। और पापा काम से बाहर चले गए। उसके बाद माँ घर संभालती थी और मैं अकेला

अकेलापन और ओवर-थिंकिंग (अति-चिंतन) इंसान के दिमाक में धीरे-धीरे ही हावी होते है। मेरे पास बात करने को सिर्फ मेरी माँ थी और कोई नहीं था। वैसे यह इतनी भी बड़ी बात नहीं है। क्योंकि काफी लोग अपने बचपन में इतने अकेले तो रहते ही हैं। लेकिन मेरी प्रॉब्लम यह थी कि मैं पूरे परिवार के साथ रहने वाला लड़का, कुछ ही सालों में अकेले रहने के जैसा ही हो गया।

उसी साल माँ ने मेरा स्कूल भी चेंज करवा दिया। पहले कम से कम मेँ अपने पुरानी सरकारी स्कूल के बच्चों से बात तो कर लेता था। अब तो वो भी नहीं हो पाता था। सच कहूँ तो मेरा बहुत ज्यादा इंट्रोवर्ट होना यहीं से शुरू हुआ था।

लड़कियों से बात करना तो दूर की बात, में तो लड़कों से भी बात नहीं करता था। क्लास के सभी बच्चे इंटरवल में खेलते थे। मौज-मस्ती करते थे। और मैं जो गेम्स पीरियड में भी क्लास में ही किताबे खोलकर बैठा रहता था। इसका मतलब यह नहीं है की में काफी पढता था। बस किताबे खोलकर बैठ जाता। स्कूल में दूसरी क्लास के इंट्रोवर्ट बच्चो को उनके इंट्रोवर्ट दोस्त मिल जाते थे। पर मेरी किस्मत ऐसी थी कि अकेला ही इंट्रोवर्ट था।

ईमानदारी से बता रहा हूँ मुझे बहुत बुरा लगता था। जब सभी स्टूडेंट्स हंसी मजाक करते और मैं चुप चाप एक जगह बैठा रहता। स्कूल में होने वाली पार्टी उनके लिए बहुत ज्यादा खुशी की बात थी। लेकिन मेरे लिए एक टेंशन, कि जब स्टूडेंट्स पार्टी की तैयारी कर रहे होंगे, कोई डांस की तैयारी कर रहा होगा, कोई पीछे की सीट्स पर दोस्तों से हंसी मज़ाक कर रहा होगा। तब तक मैं क्या करूंगा। उस दिन तो किताबे भी नहीं होंगी में किससे बात करूँगा।

ऐसे हज़ारों किस्से होते थे, जब टीचर और ज़्यादातर स्टूडेंट्स मेरा मज़ाक बनाते। और पूरी क्लास मुझ पर हंसती थी। एक पल में मेरी आंखें भर आती। यह तो सिर्फ़ स्कूल की बात है, किस्से तो वो भी थे जब मैं रिश्तेदारों की शादियों में जाता था। सब अपने काम में लगे रहते थे।और मैं चुप-चाप बैठा रहता। मेँ बार-बार अपने शरीर की एक्टिविटीज़ करके और आंखें रोल करके, यह दिखाने की कोशिश करता था कि मैं भी नॉर्मल इंसान हूं। ताकि उनमें से कोई मेरे पास आकर भी बैठ जाए। और बाकी लोग मुझे देखकर सुस्त और इंट्रोवर्ट ना कहे।

इन सब परेशानियों में लगभग मेरे 8-9 साल गुज़र गए। अब मैं लगभग 20 साल का हो गया था।

इंट्रोवर्ट से एक्सट्रोवर्ट बना :

मैंने 11वीं कक्षा पूरी कर ली थी। इस बार मेरे परिवार ने मेरा स्कूल फिर से बदलवा दिया। इस बार स्कूल बदलवाना चौथी या शायद पांचवीं बार था।

लेकिन इस बार मुझमें एक बात अलग थी। मैंने एक्सट्रोवर्ट होने के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा। इसका कारण यह था कि मुझे खुद से कोई उम्मीद नहीं थी। पर उम्मीद खोने का सबसे अच्छा फायदा यह हुआ कि मुझमें इस बात का बिल्कुल प्रेशर या स्ट्रेस नहीं था, कि मैं नए स्कूल में कैसे एडजस्ट हो पाऊंगा।

ये पहली बार था कि मैं इतना रिलैक्स था। जबकी मैं नए लोगों के साथ रहने वाला था। बस यही मेरी लाइफ का पहला टर्निंग पॉइंट था। वो लोग मेरे लिए नए थे। और मैं उनके लिए नया था। मैंने कुछ भी जानबूझ कर बहुत ज्यादा बोलने की कोशिश नहीं की। मेरे दिल का शाँत (रिलैक्स) और स्ट्रेस-फ्री होने का कारण यह था कि, मैं अपनी जिंदगी में यह प्रेशर बहुत बार झेल चुका था। मुझे पूरी तरह से अंदाज़ा था कि ज्यादा से ज्यादा क्या ही हो सकता है। इसी वजह से, मेने बिना किसी प्लानिंग के ही अगले दिन अपने पास बैठे लड़कों से बात की। मैं इतनी आसानी से बोल पा रहा था इस बात का मुझे यकीन ही नहीं हुआ। उस वक्त मेरे दिल में सिर्फ एक ही बात आयी कि : यह तो बिल्कुल आसान है।

फिर धीरे-धीरे कुछ ही दिनों में कुछ और विद्यार्थियों से मेरी बात होती हुई। कुछ ही दिनों में सब कुछ इतना आसान होने लगा, कि मैं क्लास के उन बच्चों में हो गया जो पीछे की बैंच पर बैठकर किसी बात पर मजाक (जोक) करते हैं। और पूरी क्लास के स्टूडेंट्स हसते है। मैं उन दिनों अपनी जिंदगी के 20 सालों में सबसे ज्यादा खुश था।

उस दिन मुझे एक बात समझ आयी। कि “अगर अपने आप को पूरी तरह बदलना चाहते हो तो सबसे पहले अपने आप को पूरी तरह से खाली करना होगा”। यह दिमाग एक कटोरे (एक बर्तन) की तरह होता है। इस कटोरे को सिर्फ स्ट्रेस और टेंशन से ही पूरा भर दोगे, तो इसमें और कुछ आएगा ही नहीं। अगर खुद को पूरी तरह बदलना है तो पुरानी खराब यादो को मिटाना होगा। और पुरानी यादें तब मिट जाती हैं, जब आपकी नई यादें खुशियों से भरी रहती हैं।

इस प्रोसेस में सब कुछ साफ़ है – अगर इंट्रोवर्ट हो, मतलब दिमाग में कोई स्ट्रेस ले रखा है। या तुम्हें शर्म आती है। इन दोनों का एक ही इलाज है, दिमाग हमेशा रिलैक्स होना चाहिए। इसके लिए 2 बातें याद रखनी जरूरी है:

  1. चाहे आप किसी भी सिचुएशन (स्थिति) में हों। कोई भी प्रॉब्लम हो, आप उस परेशानी की हर एक लिमिट (सिमा) को पहले ही सोच लीजिये।। कि ज़्यादा से ज़्यादा क्या ही होगा। क्युकी हमें वही चीज़ें सबसे ज़्यादा सॉक (स्तब्ध) करती हैं, जिनके बारे में हमने कभी सोचा ही नहीं होता। क्योंकि प्रॉब्लम कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वो तब तक बड़ी होती है जब तक वो हमारे जीवन में पहली बार होती है। दूसरी और तीसरी बार वो आधे से भी कम हो जाती है। इसलिए किसी भी सिचुएशन की सभी पॉसिबिलिटीज को पहले ही सोच लो और उन पर ध्यान रखो। इस सिचुएशन में स्ट्रेस कम होता है। और स्ट्रेस कम है तो सही फैसला लेने के चांस (संभावना) भी बढ़ जाते हैं।
  2. दूसरी बात, अगर आपको डर/घबराहट/शर्म महसूस होती है , किसी से बात करने में। तो सोचो, ज़्यादा से ज़्यादा क्या ही हो होगा। सामने वाला रिप्लाई नहीं देगा या इग्नोर करेगा। फ़र्क नहीं पड़ता, एक इंसान नहीं तो दूसरा इंसान रिप्लाई देगा, और तीसरा सीधा आपसे बात करेगा। और आपसे रिप्लाई की उम्मीद करेगा। दुनिया ऐसी ही है, लोग एक जैसे ही होते हैं।

क्या मेरा एक्सट्रोवर्ट होना इतना ज़रूरी है, या इसकी ज़रूरत ही नहीं थी?

मेरे एक्सट्रोवर्ट इंसान बनने के बाद ये सवाल मेरा सबसे बड़ा कन्फ्यूजन (उलझन) बन गया। इस टाइम में लगभग 23 या 24 साल का था।

वैसे मैं एक आस्तिक आदमी था और आस्तिक होना मुझे जीवन का आधार देता था। अगर आप भी आस्तिक और नास्तिक होने में कन्फ्यूज हैं तो ये पढ़ें :

आस्तिक या नास्तिक? किसमें है जीवन का सच्चा सार!

इन पिछले 3 सालों में मैंने बहुत कुछ किया। 5 से 10 दोस्त और 2 बेस्ट फ्रेंड्स। एक दोस्त तो बिलकुल भाई जैसा था। हम सारे दिन बात करते रहते। कभी कहीं घूम आते कभी कहीं घूम आते। सारे कॉलेज टाइम में मौज मस्ती, हंसी मज़ाक।

पर ये मैं नहीं था, यह सब मुझे शुरुवाती कुछ सालो में अच्छा लगा लेकिन बाद में लगने लगा कि ये सिर्फ एक डिस्ट्रैक्शन (ध्यान भटकना) है। क्योंकि मेरा दिल लगता था दोस्तों और घरवालों के साथ, लेकिन जब मैं अकेला होता हूँ तो बेचैन हो जाता हूँ। अब मैं उस पल को सोचता था जब मैं अकेला रहता था। मैं जानता हूँ कि दूसरे लोगों की बातें मेरा दिल दुखाती थीं। लेकिन मैं खुद के लिए अकेला काफी था। मैं अकेला भी खुश रह लेता था। मुझे टेंशन सिर्फ तब होती थी, जब मुझसे किसी इंसान या ग्रुप से बात करनी नहीं आती थी या जब वो मुझ पर हंसते थे।

कुल मिलाकर बात यह है कि उस समय खुश रहने के लिए मुझे किसी की जरूरत नहीं थी। यह अकेलापन मुझे आज की तरह बेचैन नहीं करता था, लेकिन बाल्की अच्छा लगने लगा था।

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